भारत के वंश

गुप्त वंश

गुप्त वंश (319ई॰ -550ई॰) के प्रमुख शासकों में- चंद्रगुप्त प्रथम, समुद्रगुप्त, चंद्रगुप्त द्वितीय, कुमार गुप्त, गुप्त जैसे प्रतापी शासक हुए। उनका शासन लगभग 200 वर्षो चला। कुषाण वंश के अंतिम शासक वासुदेव को पद से हटाकर श्री गुप्त ने गुप्त वंश की स्थापना की थी। श्री गुप्त के बाद उसका पुत्र घटोत्कच इस वंश का शासक बना। घटोत्कच के बाद उसका पुत्र चंद्रगुप्त प्रथम जो गुप्त साम्राज्य का सबसे प्रतापी शासक हुआ। इसी समय गुप्त वंश विस्तार की चरम सीमा पर पहुंचा।

चंद्रगुप्त प्रथम (319 से 335 ई॰)

गुप्त अभिलेखों से हमें ज्ञात होता है कि चंद्रगुप्त प्रथम गुप्त वंश का पहले स्वतंत्र शासक था। इसे वास्तविक संस्थापक भी माना जाता है। चंद्रगुप्त प्रथम गुप्त वंश के दुतिय शासक घटोत्कच का पुत्र था। इसने (319 से 320 ई॰) में गुप्त संवत प्रारंभ किया था जिसे गुप्त संवत के नाम से जाना जाता था। चंद्रगुप्त प्रथम ने महाराजाधिराज की उपाधि धारण कर ली थी। चंद्रगुप्त ने लिच्छवी राजा की पुत्री कुमार देवी जी से विवाह कर लिया था उस समय लिच्छवी के पास वैशाली और नेपाल दो राज्य हुआ करते थे। इस पर उसने दोनों राज्यों पर अधिकार कर लिया था। चंद्रगुप्त से वैष्णव धर्म के उपासक थे।पहला गुप्त सम्राट था जिसने सोने के सिक्के चलवाये और उन पर अपनी पत्नी कुमार देवी का नाम खुदवाया।

समुद्रगुप्त (335 से 380 ई॰)

चंद्रगुप्त प्रथम के बाद उसका पुत्र समुद्रगुप्त लगभग 335 ईसवी में राजगद्दी पर बैठा। समुद्रगुप्त गुप्त वंश का एक महान योद्धा तथा कुशल सेनापति था। इसी कारण उसे भारत का नेपोलियन कहा जाता हैं। इसी के शासनकाल को चाहे राजनीतिक या सांस्कृतिक दृष्टिकोण से देखा जाए दोनों से ही यह गुप्त काल का उत्कर्ष काल माना जाता है। समुद्रगुप्त ने कविराज की उपाधि धारण करके कविताएं लिखा करता था। समुद्रगुप्त के दरबार में हरीसेन सुशोभित हुआ करते थे। जिनकी दो पुस्तकें इलाहाबाद प्रयाग प्रशस्ति और प्रयागराज प्रशस्ति है।इसके शासनकाल से हमें कुछ ऐसी मुद्राए प्राप्त होती हैं जिसमें समुद्रगुप्त को वीणा बजाते दिखाया गया है। एक विशाल साम्राज्य की स्थापना और इस अवसर पर सोने के सिक्के जारी किए समुद्रगुप्त ने लगभग 40 वर्ष वर्षों तक गुप्त राजगद्दी को संभाला।

चंद्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य), (380 से 415 ई॰)

समुद्रगुप्त की मृत्यु के बाद उसका बड़ा पुत्र राम गुप्त गद्दी पर बैठा परंतु एक दुर्बल शासक सिद्ध हुआ। चंद्रगुप्त द्वितीय उसकी हत्या कर गुप्त साम्राज्य की राजगद्दी हासिल की। चंद्रगुप्त द्वितीय अपने पूर्वजों की भांति एक महान योद्धा था। इसने अपने शासनकाल में मिले हुए राज्य को बचाया बल्कि राज्य पर विजय प्राप्त कर गुप्त साम्राज्य का विस्तार किया। चंद्रगुप्त द्वितीय ने अनेक विजयों के बाद अपने पिता की भांति अश्वमेघ यज्ञ कराया और विक्रमादित्य की उपाधि धारण की और चांदी के सिक्के चलाएं। ऐसा माना जाता है कि चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने सको पर विजय प्राप्त की इसी के शासन काल में चीनी यात्री फह्यान भारत आया था।

प्राचीन इतिहास में चंद्रगुप्त द्वितीय का शासनकाल साहित्य और कला का स्वर्ण युग कहा जाता है। चंद्रगुप्त विक्रमादित्य को गुप्त वंश का हीरा का जाता है।चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने अपने साम्राज्य की दो राजधानी घोषित की पाटलिपुत्र, उज्जयिनी। दोनों शिक्षा के केंद्र हुआ करते थे। चंद्रगुप्त द्वितीय ने सबसे पहले रजत चांदी की मुद्रा प्रचलित की। इसने अपने दरबार में विद्वानों, कलाकारों, लेखकों को आश्रय प्रदान किया था। इसके राज दरबार में नवरत्न कालिदास, धनवंतरी, छपड़क, अमर सिंह, शंकु, अमर सिंह, घटकपर्ण, वराह मिहिर, वररुचि, बेतालभट्ट थे।

कुमारगुप्त प्रथम (415 – 454 ई॰)

चंद्रगुप्त द्वितीय की मृत्यु के पश्चात उसका पुत्र कुमारगुप्त प्रथम इसका अगला शासक हुआ। इसकी माता का नाम ध्रुव देवी था। गुप्त काल से हमें जितने भी अभिलेख प्राप्त हुए उनमें सर्वाधिक अभिलेख कुमारगुप्त प्रथम के थे। कुमारगुप्त प्रथम वैष्णव धर्म का अनुयाई था। कुमारगुप्त के अभिलेखों से प्राप्त होता है कि इसने महिंद्रा गुप्त की उपाधि प्राप्त की थी। कुमारगुप्त ने अपने शासनकाल में मयूर प्रकार की स्वर्ण मुद्राएं चलाएं। कुमारगुप्त के शासनकाल में ही हुनो ने भारत पर आक्रमण किया जो चीन के बर्बा है। बरबा का अर्थ होता है वे लोग जिनके अंदर दया ना हो। कुमारगुप्त अपने शासन के दौरान मयूरआकृत की रजत मुद्राओं का प्रचलन किया था। कुमारगुप्त ने पटना बिहार में नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना कराई।

स्कंद गुप्त (455 – 467 ई॰)

स्कंद गुप्त गुप्त वंश का सबसे प्रतापी शासक था। स्कंद गुप्त ने देवराज की उपाधि धारण की थी। स्कंद गुप्त ने मौर्यों के द्वारा निर्मित सुदर्शन झील का पुनर्निर्माण कराया था। अजंता और एलोरा की अद्भुत कलाकृतियों अद्वितीय रचनाओं का निर्माण इसके शासनकाल में हुआ था। इनके शासनकाल में पहली बार हुनों का आक्रमण किया था। इसने पुष्यमित्र पर विजय प्राप्त कर ली थी। उनके शासन काल की महत्वपूर्ण घटना यह थी कि इसने हुणों को पराजित करके आर्यों की संस्कृति को बचाया। स्कंद गुप्त की मृत्यु के पश्चात गुप्त वंश का कोई भी शासक हुनो के आक्रमण को रोकने में कोई भी सक्षम ना हुआ और गुप्त वंश यहीं पर समाप्त हो गया।

गुप्त वंश

गुप्त काल का सांस्कृतिक विकास

  • गुप्त काल में ही सबसे पहले मंदिरों के निर्माण की प्रथा प्रारंभ हुई थी।
    • देवगढ़ का विश्व मंदिर (झांसी),
    • दशावतार मंदिर (झांसी),
    • भूमरा का शिव मंदिर (मध्य प्रदेश),
    • गोवा का विष्णु मंदिर (मध्य प्रदेश),
    • लक्ष्मण मंदिर (सिरपुर),
    • भीतरपुर गांव का मंदिर (कानपुर देहात)
  • गुप्त काल में ही मूर्तियों के निर्माण की प्रथा प्रारंभ हो गई थी। सारनाथ में महात्मा बुद्ध की मूर्ति, मथुरा में भगवान गोवर्धन धारी श्री कृष्ण की मूर्ति, विदिशा की वाराहा अवतार की मूर्ति, झांसी में भगवान विष्णु की मूर्ति।
  • काशी से महावीर स्वामी की मूर्ति गुप्त काल की कुछ प्रमुख मूर्तियों का निर्माण किया गया।
  • कायस्थ जाति का उदय गुप्त काल में ही हुआ था।
  • संस्कृत के महा विद्वान कालिदास ने गुप्त काल में ही मां ग्रंथों की रचना की थी जो चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के राज्य में सुशोभित होते थे।
  • आर्यभट्ट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के दरबार में सुशोभित होते थे जिनका जन्म 476 ईसवी में पटना में हुआ था। ये गुप्तकाल के प्रसिद्ध खगोलशास्त्री और गणितज्ञ होते थे। इन्होंने सूर्य सिद्धांतिका और आर्यभट्ट ग्रंथ लिखे।
  • वराह मिहिर की गुप्त काल के खगोल शास्त्री थे जिन्होंने बृहद संहिता और पंचासिद्धांतिका की रचना की।
  • अजंता और एलोरा की गुफाएं का निर्माण गुप्त काल में हुआ।
  • गुप्त काल में पंचतंत्र की रचना विष्णु शर्मा तथा हितोपदेश की रचना नारायण पंडित ने की कामसूत्र की रचना वात्सायन ने की थी।
  • चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के राज दरबार में आयुर्वेद के महाविद्वान धनवंतरी और सुश्रुत सुशोभित होते थे।
  • सती प्रथा और छुआछूत की पहली घटना गुप्त काल से ही मिलती है।
  • दशमलव और शून्य का आविष्कार गुप्त काल में ही हुआ था।
  • चित्रकला, मूर्तिकला, वास्तु कला, नृत्य कला और संगीत कला में आशा तीर्था वृद्धि हुई थी।
  • धनवंतरी ने रस चिकित्सा की रचना की थी। इसी पुस्तक में उन्होंने बताया था कि लोहा तांबा सोना से हमारे शरीर को लड़ने की क्षमता मिलती है।
  • मेघदूत, ऋतुसंहार, अभिज्ञान शाकुंतलम्, मालविकाग्निमित्रम्, कुमारसंभव, विक्रम वर्षीय की रचना करने वाले कालिदास इसी काल में सुशोभित होते थे।

यूरोपीय शक्तियों का भारत आगमन
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हर्यक वंश

हर्यक वंश का संस्थापक और प्रथम शक्तिशाली शासक बिंबिसार था। जिसने 544 ईसापुर राजगृह (गिरीब्रज) को अपनी राजधानी घोषित कर दी थी।ईसने मगध के सिंहासन पर 52 वर्षों तक शासन किया था। बिंबसार महात्मा बुध का समकालीन था। यह बौद्ध धर्म का अनुयाई भी हुआ करता था। इसकी राजधानी राजगृह पहाड़ियों और नदियों से गिरी थी। इसका मुख्य द्वार विशाल पत्थरों की दीवारों से बना था। यही कारण था कि अविजित था।

प्रसिद्ध राजवेध जीवक इसी के दरबार में सुशोभित हुआ था। अवंती के राजा प्रदुम जब पांडु रोग से पीड़ित थे और महात्मा बुद्ध की सेवा सूर्यांश के लिए इसने जीवक को भेजा था।बिंब्सार इतिहास में एक ऐसा पहला शासक था। जिसने युद्ध को बढ़ावा ना देकर वैवाहिक संबंधों को बढ़ावा दिया। उसने कौशल नरेश प्रसेनजीत की बहन महाकौशल वैशाली नरेश की पुत्री और मद्रदेश पंजाब की राजकुमारी छेमा के साथ उसने विवाह कर लिया था।

बिंबसार की हत्या उसके पुत्र अजातशत्रु ने 493 वर्ष ने की थी इसी समय प्रथम बौद्ध संगीति का आयोजन हुआ था। अजातशत्रु की हत्या उसी के पुत्र उदयन ने 461 ईसा पूर्व में की थी। उदयन वंश का अंतिम शक्तिशाली शासक था जो जैन धर्म का अनुयाई था। उदयन ने पाटिल ग्राम नगर की स्थापना की। जो आगे चलकर पाटलिपुत्र के नाम से जाना गया और आज कल उसे पटना कहते हैं। उदयन की हत्या उसके पुत्र नाग दशक ने की थी। जो हर्यक वंश का अंतिम राजा था इस पीत्र घाटी वंश से तंग आकर उसी के नाग दशक को पदच्युत कर लिया था और शिशुनाग वंश की स्थापना की।

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भारतीय संविधान की अनुसूचियां

हर्यक वंश

शिशुनाग वंश

शिशुनाग वंश का संस्थापक शिशुनाग था पाटलिपुत्र को हटाकर वैशाली को राजधानी बनाया। ये बौद्ध धर्म का अनुयाई था। इसी काल में वैशाली में द्वितीय बौद्ध संगीति का आयोजन किया गया था। इस वंश का अंतिम राजा नंदी वर्धन था।

नंद वंश

सिकंदर इस वंश का संस्थापक पद्मानंद अत्यंत शक्तिशाली शासक था। इसने सिंचाई के लिए नहरे के निर्माण की प्रथा आरंभ की थी। इसने अविजीत कलिंग को जीतने की कोशिश की थी इस वंश का अंतिम शासक घनानंद एक अत्यंत आयोग्य व विलासी शासक था। इसी समय सिकंदर ने भारत पर आक्रमण किया था।

सिकंदर यूनान के प्रसिद्ध दार्शनिक अरस्तु का शिष्य था। ऐसा माना जाता है कि तक्षशिला के राजा आंभी ने सिकंदर का भारत पर आक्रमण करने का निमंत्रण भेजा था। जिससे कि पंजाब के राजा पोरस को पराजित किया जा सके। सिकंदर ने बैक्टीरिया को जीते हुए काबुल के मार्ग से सिंध नदी को पार करते हुए हिंदूकुश पर्वत की ऊंचाईयो को लांघते हुए उत्तर-पश्चिम सीमा से भारत में प्रवेश किया था।

भारत में आने के तुरंत बाद सिकंदर का सामना पंजाब के राजा पोरस के साथ झेलम नदी के तट पर हुआ था। जिसमें राजा पोरस की पराजय हुई। इस युद्ध को इतिहास में हाईडेस्पीच का युद्ध कहा जाता है। मध्य भारत की ओर बढ़ते हुए सिकंदर की सेना जब व्यास नदी के तट पर पहुंची तो सैनिकों ने व्यास नदी को पार करने से मना कर दिया।

सिकंदर का आक्रमण

जिस समय उत्तर भारत में मगध के साम्राज्य का उत्कर्ष हो रहा था उस समय संपूर्ण भारत छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित हो गए थे। जो एक दूसरे से संघर्षरत रहते थे। इस राजनैतिक कमजोरी का लाभ उठाकर सिकंदर ने 326 ईसा पूर्व में भारत पर आक्रमण कर दिया था। सिकंदर यूनान के निकट में मेसो डोनिया के राजा फिलिप द्वितीय का पुत्र था। सिकंदर ने मात्र 20 वर्ष की आयु में ईरान के हक मनी और पार्षिक साम्राज्य को जीत लिया था। सिकंदर 23 वर्ष की आयु में यूनान का शासक बन गया।

सिकंदर द्वारा आक्रमण के कारण

  • विश्व विजेता बनने की इच्छा।
  • धन प्राप्त करने की इच्छा।
  • नए प्रदेशों को नजदीक से जानने की इच्छा।
  • भारतीय शासकों को सहायता का वचन।

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