भारत की प्रमुख नदियां

भारत की प्रमुख नदियां

भारत की प्रमुख नदियां निम्नवत वर्गीकृत की जा सकती है-

उत्तर भारत की प्रमुख नदियां

उत्तरी भारत में नदियों के निम्न तीन तंत्र पाए जाते हैं-

सिंधु क्रम की नदियां

सिंधु नदी लद्दाख श्रेणी के उत्तर से निकलती है।अनेक श्रेणियों व शिखरों से हिम नदियों का जल प्राप्त करके यह नदी लद्दाख श्रेणी को काटकर बहती है तथा पश्चिमी पंजाब के मैदान में उतरती है।भारत में कुल 134 किलोमीटर लंबाई तथा 1.18 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर प्रवाहित होती है। इसकी सहायक नदियां सतलुज, चुनाव, रावी, झेलम तथा व्यास है।

1. सतलुज नदी– कैलाश श्रेणी के दक्षिणी ढाल पर स्थित मानसरोवर झील के निकट राक्षस ताल से यह निकलती है। शिपकी स्थान के निकट या तिब्बत से भारत में प्रवेश करती है। हिमाचल प्रदेश के निकट इसकी सहायक नदी स्पीति मिलती है। सतलुज के संकरे खंड 900 मीटर से अधिक गहरे हैं।शिवालिक श्रेणी को काटकर रूपढ़ के निकट इस पर भांगड़ा बांध बनाया गया है। भारत में इसकी लंबाई 1050 किलोमीटर तथा अपवाह क्षेत्र 24000 वर्ग किलोमीटर है।

2. चिनाव नदी- हिमाचल प्रदेश में टांडी स्थान पर चंद्रा व भामा नदियों के संगम से यह नदी बनती है। महा हिमालय व पीर पंजाल श्रेणियों के मध्य संकरी घाटी है। भारत में इसकी लंबाई 180 किलोमीटर क्षेत्र 26755 वर्ग किलोमीटर है।

3. झेलम नदी- कश्मीर में शेषनाग झील से निकलकर, वूलर झील में होकर बहने वाली नदी हिमालय व पीर पंजाल श्रेणियों के मध्य बहती है। इसकी लंबाई 400 किलोमीटर तथा अपवाह क्षेत्र 28490 वर्ग किलोमीटर है।

4. रावी नदी- व्यास नदी पंजाब की सबसे छोटी नदी है। इसका उद्गम बंगाल बेसिन में धौलाधार श्रेणी के उत्तरी ढालो से हैं। यह संकीर्ण घाटी के तीव्र ढाल बनाकर प्रवाहित होती है। बसौली के निकट या मैदान में प्रविष्ट होती है। इसकी कुल लंबाई 725 किलोमीटर तथा अपवाह क्षेत्र 5997 किलोमीटर है।

5. व्यास नदी- इस नदी का उद्गम रावी के स्रोत के निकट ही है।कोठी व लारजी दरों में प्रवाहित होती हुई यह धौलाधार श्रेणियों को काटकर हिमाचल प्रदेश में कुल्लू, मंडी व कांगड़ा जिलों में बहती हुई कपूरथला के निकट सतलुज नदी से मिलती है। यह 470 किलोमीटर लंबी है तथा इसका अपवाह क्षेत्र 25900 वर्ग किलोमीटर में विस्तृत है।

6. सरस्वती नदी- सरस्वती नदी का उद्गम हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले की शिवालिक पहाड़ियों में है। भवानीपुर के आगे कुछ दूरी तक मरुभूमि में विलुप्त हो कर यह पुनः करनाल के निकट उभरती है। घग्गर नदी का उद्गम भी इसी प्रदेश में होता है। यह पटियाला में रसूला स्थान पर सरस्वती से मिलती है। इसके आगे यह नदी हकारा या सोतार कहलाती है, जो एक शुष्क घाटी के रूप में विद्यमान हैं। सरस्वती नदी बीकानेर में हनुमानगढ़ के निकट मर भूमि में लुप्त हो जाती है।

गंगा क्रम की नदियां

1. गंगा नदी- इस नदी की मुख्य शाखा भागीरथी नदी गढ़वाल में गंगोत्री नामक हिमनद से निकलती है।देवप्रयाग स्थान पर इसमें अलकनंदा मिलती है, और यहीं से यह मध्य हिमालय और शिवालिक श्रेणी को काटती हुई गंगा नदी के नाम से ऋषिकेश और हरिद्वार पहुंचती है। यह उत्तरी भारत की सबसे प्रमुख नदी है।यह तीन महाद्वीपों में सबसे बड़ी नदी है। यह हिंदुओं की सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक नदी है। इस कारण इसके किनारे पर गंगोत्री से लेकर मुहाने तक अनेक तीर्थ स्थान ऋषिकेश, हरिद्वार, प्रयाग, वाराणसी विशेष है। इसके किनारे उत्तर भारत के सभी बड़े-बड़े तथा महत्वपूर्ण नगर स्थित है। आगे चलकर यह मेघना नदी मैं मिलकर बंगाल की खाड़ी में गिर जाती है। गंगा नदी का अपवाह क्षेत्र 951600 वर्ग किलोमीटर है।

2. यमुना नदी- यमुना नदी यमुनोत्री हिमनद से निकलकर जगाधरी के निकट मैदानी क्षेत्र में प्रवेश करती है। यार नदी उत्तर प्रदेश में गंगा नदी के समानांतर बैठकर इलाहाबाद के निकट गंगा नदी में मिल जाती है। इसका अपवाह क्षेत्र 359000 वर्ग किलोमीटर है। दिल्ली, मथुरा, आगरा आदि इस नदी के तट पर स्थित प्रमुख नगर हैं। चंबल, बेतवा, केन प्रायद्वीपीय पठार से आने वाली इस के महत्वपूर्ण सहायक नदियां हैं।

3. रामगंगा नदी- यह महा हिमालय श्रेणी के दक्षिण में नैनीताल जिले में निकलती है। कालागढ़ में या मैदान में प्रविष्ट होती है तथा कन्नौज के निकट या गंगा से मिलती है। यह 600 किलोमीटर लंबी है।

4. शारदा नदी- मिलान हिमनद से निकलकर यहां गोरी गंगा कहलाती है। धर्मा व लिसार इसकी ऊपरी सहायक है। ब्रह्मदेव के निकट काली नदी सरयू या शारदा कहलाती है। ब्रहराम घाट के निकट या घाघरा नदी में मिलती है।

5. घाघरा नदी- यह पर्वतीय भाग में कोरियाली एवं मैदानी भाग में घागरा कहलाती है। इसका उद्गम तकलाकोट के उत्तर-पश्चिम में माकचा चुन्गु हिमनद में है। गुरला मांधाता के दक्षिण व पश्चिम में सिर्फ का चक्कर लगाकर यह महा हिमालय और शिवालिक श्रेणी को पार करती है। मैदान में उतरकर या शारदा नदी से मिलती है एवं छपरा के निकट गंगा से मिल जाती है तथा इसकी कुल लंबाई 1180 किलोमीटर तथा अपवाह क्षेत्र 1.27 लाख वर्ग किलोमीटर है।

6. ताप्ती नदी- इसका उद्गम नेपाल के पिछले भाग में होता है। दक्षिणी-पश्चिमी-दक्षिणा दिशा में बेहतर या 640 किलोमीटर यात्रा तय करके बरहज के निकट घाघरा से मिलती है।

7. गंडक नदी- यहां नेपाल में शालिग्राम ई तथा मैदान में नारायणी कहलाती है। इसकी दो मुख्य सहायक नदियां पश्चिम में काली व पूर्व में त्रिशूल गंगा है। शिवालिक श्रेणी को पार करके पटना के निकट यह गंगा से मिलती है। यहां नदी 425 किलोमीटर लंबी है तथा इसका समस्त अपवाह क्षेत्र 45800 वर्ग किलोमीटर है तथा भारत में यह 9540 वर्ग किलोमीटर तक फैली है।

8. कोसी नदी- गंगा की सबसे बड़ी सहायक नदी है। इसके मुख्य धारा अरुण नदी है जो सापू नदी के दक्षिण पश्चिम में 320 किलोमीटर तक बहती है। इस नदी में हिमनद से निकलने वाली अनेक जलधाराएं आकर मिलती है। महा हिमालय श्रेणी में तंग घाटी में बहने के बाद शिवालिक पहाड़ियों को पार कर यह जयनगर नामक स्थान पर मैदान में उतरती है। इस नदी ने अनेक बार मार्ग परिवर्तन किए हैं। वर्षा काल में यह अत्यंत विनाशकारी होती है, अतः इसे बिहार का शोक कहते हैं। नदी की कुल लंबाई 730 किलोमीटर तथा अपवाह क्षेत्र 86900 वर्ग किलोमीटर है।

9. चंबल नदी- यह मध्य प्रदेश में मऊ के निकट 600 मीटर ऊंची जानापाव पहाड़ी से निकलती है। यह इटावा से लगभग 40 किलोमीटर पूर्व में यमुना से मिलती है। कालीसिंध, सिप्ता, पार्वती व बनास इसकी प्रमुख सहायक नदियां हैं। योगी इसके द्वारा अपरदन से गहरे गड्ढे व बिहार उत्पन्न हुए हैं, जो लंबे अरसे तक डाकुओं के सरल स्थल बने रहे हैं। चंबल नदी 965 किलोमीटर लंबी है।

10. सिंध नदी- यह राजस्थान के टोंक जिले में नैनवास स्थान से निकलती है। इसकी लंबाई 416 किलोमीटर है। जगनपुर के निकट यह यमुना से मिलती है।

11. बेतवा नदी- यह मध्यप्रदेश में भोपाल के दक्षिण-पश्चिम से निकलकर हमीरपुर के निकट यमुना से मिलती है। यह 480 किलोमीटर लंबी है।

12. केन नदी- इसका उद्गम कैमूर पहाड़ीयो के उत्तरी ढाल पर है। बुंदेलखंड में प्रवाहित होती हुई यह यमुना में मिलती है।

ब्रह्मपुत्र क्रम की नदियां

ब्रह्मपुत्र नदी को ब्रह्मा की पुत्री कहा जाता है। यह गंगा में मिलने वाली सबसे बड़ी नदी है।याद दक्षिणी पश्चिमी तिब्बत में मानसरोवर झील एम कैलाश पर्वत के पूर्व निकलकर दक्षिणी तिब्बत में पश्चिम से पूर्व की ओर 1290 किलोमीटर तक बहकर असम हिमालय को पार करती है। तिब्बत में यहां सांगपो के नाम से जानी जाती है, जो नमचा बरवा पर्वत के निकट दक्षिण की ओर मुड़कर अरुणाचल राज्य में प्रवेश कर जाती है।

मेघालय पठार की बांधा के कारण यह दक्षिण की ओर घूमकर बांग्लादेश में प्रवेश करती है। ब्रह्मपुत्र जिस स्थान पर हिमालय को काटती है दिहांग कहलाती है। तिब्बत में ब्रह्मपुत्र की मुख्य सहायक मनास, मटेली, सुबनसिरी लोहित आदि नदियां हैं। इसकी कई सहायक नदियां इसकी प्रवाह दिशा में बहती हैं। तिस्ता नदी बांग्लादेश के उत्तरी भाग में इससे मिलती है। दार्जिलिंग क्षेत्र में यह एक बड़ी उग्र नदी बन जाती है।

मणिपुर राज्य के उत्तरी भाग में प्रारंभ होने वाली सुरमा नदी अनेक जलप्रपात बनाकर कछार जिले में पश्चिम की ओर मुड़ती है। बदरपुर पहुंचने पर दो शाखाओं में विभक्त हो जाती है।आगे यह दोनों शाखाएं मिलकर संयुक्त धारा के रूप में यमुना में मिल जाती हैं। बांग्लादेश में ब्रह्मपुत्र को जमुना कहते हैं। इसकी संयुक्त धारा बहुत चौड़ी होकर एक बड़ी अस्चुरी बनाती है, जिसमें बहुत से दीप विद्वमान हैं।

बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियां

दक्षिण के पठार से निकलकर पूर्व की ओर बहकर बंगाल की खाड़ी में निम्नलिखित नदियां गिरती है-

1. महानदी- यह 858 किलोमीटर लंबी है। इसका जल प्रवाह क्षेत्र 132050 वर्ग किलोमीटर है।यह मध्य प्रदेश में अमरकंटक के दक्षिण में सिहावा से निकलकर पूर्वा दक्षिण पूर्व की ओर बहती हुई कटक के निकट बड़ी डेल्टा बनाती है। इसके बाय और तेल नदी इसका प्रमुख सहायक नदी है।यह डेल्टा में अनेक शाखाएं बनाकर बहती है। इसका डेल्टा अत्यंत उपजाऊ है। हीराकुंड, टिकरापारा व बराज इस नदी पर प्रमुख बहुउद्देशीय योजनाएं बनाई गई हैं।

2. ब्राह्मणी, वैतरणी और स्वर्ण रेखा नदियां- ब्राह्मणी और स्वर्णरेखा नदी या छोटा नागपुर पठार पर रांची के दक्षिण पश्चिम से निकलती है तथा वैतरणी नदी उड़ीसा के क्योंझार पठार से निकलती है। ब्राह्मणी नदी कोयल और सांख नदियों की संगत धारा की देन है। यह 750 किलोमीटर लंबी है। वैतरणी और ब्राह्मणी नदियां संयुक्त होकर बंगाल की खाड़ी में गिरती है।

3. गोदावरी नदी- प्रायद्वीप की सबसे बड़ी तथा भारत की गंगा के बाद दूसरी सबसे बड़ी नदी है। यह 1465 किलोमीटर लंबी है। उत्तर में इसकी प्रमुख सहायक नदियां प्रणहिता, पैनगंगा, वर्धा, वैनगंगा तथा इंद्रावती है। दक्षिण में मंजीरा नदी प्रमुख है, जो हैदराबाद के निकट इसमें मिलती है।गोदावरी के निचले भाग में बाड़े आती रहती हैं। इसी भाग में नव्या नदी बहती है। इस नदी पर अनेक जलविद्युत योजनाएं बनाई गई हैं।

4. कृष्णा नदी- यह प्रायद्वीपीय भारत की दूसरी विशाल नदी है। महाबलेश्वर के निकट से निकलकर दक्षिण पूर्व दिशा में 1400 किलोमीटर की लंबाई में बहती है तथा इसका प्रवाह क्षेत्र 259000 वर्ग किलोमीटर है। कोयना,यरला, वर्न्ना, पंच-गंगा, दूधगंगा, घटप्रभा, मालप्रभा,भीमा, तुंगभद्रा और मूसी इसकी प्रमुख सहायक नदियां हैं। जल विद्युत योजनाओं की दृष्टि से इस नदी का विशेष महत्व है। कृष्णा नदी दक्षिण भारत का दूसरा बड़ा डेल्टा बनाती है।इस नदी पर विशाल नागार्जुन बांध बनाया गया है।

5. दामोदर नदी- यह नदी छोटा नागपुर पठार से दक्षिण-पूर्व से निकलकर पूर्व दिशा में बहती हुई आसनसोल के निकट दक्षिण पूर्वी दिशा में मुड़ जाती है। डायमंड हार्वर के निकट प्रिया हुगली नदी में प्रवेश पाती है और इसी के निकट रूपनारायण नदी भी हुगली में जाकर गिरती है। यह नदी 541 किलोमीटर लंबी है और 24000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को सिंचाई की सुविधाएं उपलब्ध कराती है।

5. कावेरी नदी- यह नदी कुर्ग जिले में 1311 मीटर की ऊंचाई से निकलकर दक्षिण पूर्व की ओर बह कर कर्नाटक तथा तमिलनाडु राज्य में बहती है। इसका अपवाह क्षेत्र 80290 वर्ग किलोमीटर है। इसे दक्षिण भारत की गंगा कहा जाता है।

अरब सागर में गिरने वाली दक्षिण भारत की नदियां

1. लूनी नदी- लूनी नदी अरावली श्रेणी में अजमेर के दक्षिण-पश्चिम से निकलती है।320 किलोमीटर लंबी यह नदी अरावली के समानांतर में अर्ध मरुस्थली प्रदेश में प्रवाहित होकर कच्छ की खाड़ी में गिरती है।

2. साबरमती नदी- यह मेवाड़ की पहाड़ियों से निकलकर 320 किलोमीटर लंबी यह नदी खंभात की खाड़ी में गिरती है।

3. माही नदी- विद्यांचल के पश्चिमी भाग में मेहद झील से निकलती है। यह 560 किलोमीटर लंबी है तथा खंभात की खाड़ी में गिरती है।

4. नर्मदा नदी- इस नदी का उद्गम अमरकंटक के पश्चिमी ढाल पर स्थित है। यह विंध्यांचल व सतपुड़ा श्रेणियों के मध्य पश्चिम की ओर बहती है। 1300 किलोमीटर लंबी इस नदी का अपवाह क्षेत्र 93000 वर्ग किलोमीटर है। यह नदी भ्रंशोत्थ घाटी में प्रवाहित होती है तथा अरब सागर में अश्चुरी बनाती है।

5. ताप्ती नदी- इस नदी का उद्गम सतपुड़ा श्रेणी के दक्षिण में मध्यप्रदेश के बैतूल जिले में है। इसके प्रमुख सहायक पूर्णा है। इसकी कुल लंबाई 700 किलोमीटर है।

डेल्टा

नदी के अंतिम अवस्था में उसका भाव बहुत मंद हो जाता है अतः उसके जल के बहाव में अवसादो को बहाकर ले जाने की शक्ति नहीं रह पाती। सागर से मिलने से पूर्व ही नदी अपने बहाव क्षेत्र में चिकनी मिट्टी की गाद एकत्र कर देती है। नदी की काप मिट्टी का यह जमाव त्रिभुजाकार होता है जिसे डेल्टा कहते हैं। यह नीचे अप नदी की धारा के मार्ग में बाधा बन जाता है अतः नदी की धारा उसे अनेक स्थानों से काट-काट कर समुद्र में प्रवेश करती हैं।

डेल्टा अनेक स्थानों पर कट जाने के कारण वृक्षों की जड़ों की तरह दिखाई पड़ता है। अवसादो का जमाव ग्रीक भाषा के अक्षर डेल्टा (∆) की तरह होता है। अतः इसका नाम डेल्टा ही पड़ गया है। कुछ नदियों के मुहाने पर ज्वार-भाटा आता है जो नदियों द्वारा एकत्रित अवसाद को बहाकर ले जाता है अतः वहां डेल्टा नहीं बन पाता है। ऐसे डेल्टा अश्चुरि डेल्टा कहते हैं।

संयुक्त राज्य अमेरिका में कोलोरेडो नदी का डेल्टा अश्चूरी डेल्टा का उदाहरण है। जिन नदियों के मुहानो पर ज्वार-भाटा आता है, वहां मिट्टी का जमाव नहीं हो पाता अतः नदियां डेल्टा नहीं बना पाती हैं। ऐसे मुहांनो को ज्वारनद मुख कहा जाता है।

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