ब्रिटिश राज के अधीन भारत

सब 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के परिणाम स्वरुप भारत में कंपनी का शासन समाप्त हो गया। अब भारत का शासन बेटे सरकार ने ग्रहण किया तथा रानी विक्टोरिया को भारत की शासिका घोषित किया गया।

बिट्टी सामग्री विक्टोरिया की घोषणा के अनुसार इंग्लैंड में भारत के शासन की देखरेख तथा नियंत्रण रखने के लिए एक मंत्री अलग से नियुक्त हुआ जो भारत मंत्री कहलाया वह ब्रिटिश संसद के प्रति उत्तरदाई था। भारत में गवर्नर जनरल वायसराय कहलाने लगा क्योंकि भारत में ब्रिटिश शासन का प्रतिनिधि था। उसकी सहायता के लिए 4 सदस्यों की समिति भी बनाई गई।साथ ही राजपूत मराठा एवं शिव की प्रमुख के साथ-साथ हैदराबाद के निजाम को अंग्रेजों के प्रति निष्ठा के लिए पुरस्कृत करते हुए उसके राज्यों को विशेष राज्य के सदस्य राज्यों के रूप में मान्यता प्रदान की गई।

भू राजस्व प्रबंधन के क्षेत्र में तालुके दारूवा जमीदारों को ब्रिटिश प्रतिनिधियों की मान्यता प्रदान की गई। यही लोग बाद में ब्रिटिश सम प्रशासन के एजेंट के रूप में कार्य करने लगे। इसी प्रकार भारतीय प्रबुद्ध वर्ग के साथ नंबर तथा मैत्री पूर्ण व्यापार का निश्चय किया गया क्योंकि ब्रिटिश शासकों की यह मान्यता थी कि निम्न तथा मध्य वर्ग के लोग हराया उच्च वर्ग का ही अनुसरण करते हैं।

ब्रिटिश शासकों को सैन्य पुनर्गठन करने को विवश होना पड़ा।यूरोपीय एवं ब्रिटिश मूल के अधिकारियों की संख्या में वृद्धि की गई। तोपखाना एवं महत्वपूर्ण मारक क्षमता वाले हथियारों से भारतीय सैनिकों को वंचित रखा गया।सैनिक में जातियों क्षेत्रों एवं संप्रदाय के आधार पर सैनिक इकाइयां बनाई गई जिससे उनमें भेदभाव बना रहे जैसे बंगाल रेजिमेंट,राजपूत रेजीमेंट।

राजनैतिक एवं प्रशासनिक पुनर्गठन

भारत में प्रशासनिक पूर्ण गठन की शुरुआत इस सरकार ने इंडिया काउंसिल एक्ट से की 1861सीवीके इस एक्ट के द्वारा गवर्नर जनरल की ग्राम शिल्प परिषद का नाम इंपीरियल लेजिस्लेटिव क्राउनसिल(imperial legislative council) कर दिया गया।

इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल के सदस्यों की संख्या 6 से 12 करने का अधिकार भी गवर्नर जनरल को था। सदस्यों में आधे सदस्य सरकारी होते थे।यह क्रम से पूरी तरह से अधिकार विहीन थी।इसका ना तो वित्तीय नियंत्रण था और ना ही प्रशासनिक।इस ग्राम सेल के द्वारा पारित कोई भी विधेयक गवर्नर जनरल के अनुमोदन के बिना कानून नहीं बन सकता था।अतः कानून के मामले में भी यह मात्र एक सलाहकार समिति थी।इसमें भारतीय सदस्य गवर्नर जनरल द्वारा नामित होते थे।अतः वह आम भारतीय जनता का प्रतिनिधित्व बिल्कुल नहीं करते थे।

आधुनिक शिक्षा का प्रभाव

भारत में आधुनिक विज्ञान का प्रयोग 19 वीं सदी के आरंभ में हुआ। उदारवादी और शिक्षा नीति के चलते भारत में विज्ञान,तकनीकी एवं प्रौद्योगिकी का विकास भी हुआ।इससे भारत वैज्ञानिक युग में प्रवेश कर सका।विश्वविद्यालयों की स्थापना के साथ उनमें विज्ञान विभाग की स्थापना हुई। अधिकार भारतीयों ने विज्ञान को अध्ययन के लिए चुना और विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किए।

चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में महेंद्र लाल सरकार का नाम उल्लेखनीय है। उन्होंने 1876 ईसीबी में इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टीवेशन ऑफ साइंस नामक संस्था की स्थापना की। बीसवीं सदी के तीसरे दशक में इंडियन साइंस कांग्रेस की स्थापना की गई।साइंस कांग्रेस के अधिवेशन में देश के विभिन्न भागों के वैज्ञानिक भाग लेते थे और एक दूसरे से अपने विचारों व कार्यों का आदान-प्रदान करते थे

प्रफुल्लचंद राय, जगदीश चंद्र बसु,और बीरबल साहनी जैसे कई वैज्ञानिकों ने ख्याति अर्जित की।सी वी रमन ने अपने कार्य और योगदान के आधार पर भौतिकी के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार भी प्राप्त किया। श्रीनिवास रामानुजन और विश्वेश्वराया इंजीनियरिंग और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में महान भारतीय वैज्ञानिक थे।इस प्रकार भारतीय वैज्ञानिकों ने अपने योगदान से विज्ञान के विकास के द्वारा देश के विकास में महत्वपूर्ण योगदान किया शिक्षा और विज्ञान के क्षेत्र में विकास कार्यो से देश को एक नई गति और प्रतिष्ठा प्राप्त हुई।

जन सुविधाओं में वृद्धि

18 वीं शताब्दी तक अंग्रेजों ने देश के धार्मिक सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में हस्तक्षेप न करने की नीति अपनाई किंतु 19वीं शताब्दी के प्रारंभ से ही उन्होंने भारतीय समाज और संस्कृति में परिवर्तन के लिए कुछ कदम उठाए।

भारत स्थित ब्रिटिश प्रशासन कुछ सीमा तक भारतीयों में आधुनिक सोच पैदा करना चाहते थे। लेकिन वही तक जहां तक ब्रिटिश हितों को नुकसान न हो।

अतः उन्होंने भारत में आधुनिकरण की संतुलित नीति अपनाई।इसी नीति के तहत अंग्रेजों ने कई हजार किलोमीटर की रेलवे लाइन विच वाई जिससे आवागमन तेज हो सके वह व्यापार को बढ़ावा मिले। अंग्रेज ठंडे प्रदेश के रहने वाले थे उन्हें भारत में पढ़ने वाली गर्मी को सहन करने की आदत नहीं थी।अता उन्होंने अपने व अपने परिवारों को भीषण गर्मी से बचाने के लिए भारत में नए नगर जैसे नैनीताल, शिमला, दार्जिलिंग बताएं।

अंग्रेजों द्वारा लागू की गई पाश्चात्य शिक्षा ने भारतीयों की संकुचित सोच को तोड़ा और उनमें नई दुनिया की ललक और जिज्ञासा जागृत कि पढ़े-लिखे भारतीय समाज की बुराइयों का विरोध करने के लिए एकजुट होने लगे। नई सोच और विकसित ज्ञान ने समाज में फैले कई अंधविश्वासों व कुरीतियों को तोड़ा।रेल गाड़ियों ने आवागमन को न केवल सरल व सुरक्षित बनाया अपितु या छुआछूत व जाति प्रथा को समाप्त करने में भी सहायक सिद्ध हुए।

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