प्रथम स्वतंत्रता संग्राम: कारण एवं परिणाम

भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम

19वीं शताब्दी के आरंभ में जब फ्रांस की क्रांति और इटली तथा जर्मनी के एकीकरण आदि घटनाओं की जानकारी भारतीयों को हुई तो उन्हें भी अपने देश को स्वतंत्र कराने के लिए तथा अंग्रेजों के शासन से मुक्ति पाने की इच्छा जाग्रत हुई। अंग्रेजों की शोषण पूर्ण तथा दमनकारी नीति से भारतीय जनता पहले से ही त्रस्त थी और संघर्ष दारा अपने असंतोष को व्यक्त करती आई थी परंतु ब्रिटिश सैनिक बल की सख्ती के कारण वह हमेशा बनी रहे। जब 1796 ईसवी में भारतीय सैनिकों को अंग्रेज अधिकारियों ने आदेश दिया कि वह तिलक ना लगाएं, दाढ़ी ना रखे, कानों में बालियां ना पहने तथा पगड़ी न पहनकर उसके स्थान पर टोप पहने। भारतीय सैनिकों ने संघर्ष करने का मन बना लिया। यद्यपि 10 जुलाई 1806 ईसवी को हुए संघर्ष का दमन करने में अंग्रेजों को सफलता तो मिल गई परंतु या संघर्ष 1857 ईसवी की क्रांति के रूप में पुनः प्रकट हो गया।1947 ईस्वी की भारतीय स्वतंत्रता की प्राप्ति के पूर्व के लगभग 100 वर्षों की अवधि में भारत में स्वतंत्रता के लिए संघर्ष अथवा राष्ट्रीय आंदोलनों की इतनी अधिक लहरें उठी कि उनको गिनना संभव नहीं है।

स्वतंत्रता के पूर्व भारतीयों के शोषण, दमन, वेदना जैसे कष्टों को ही स्वतंत्रता का संघर्ष या राष्ट्रीय आंदोलन का नाम दिया जाता है। वास्तव में, विदेशी शासन से मुक्ति पाने के लिए भारतीय जनता द्वारा किया गया संघर्ष ही स्वतंत्रता-प्राप्त का संघर्ष एवं राष्ट्रवाद का उदय था। 19वीं शताब्दी के आरंभ में ही भारत में राष्ट्रीय जागरण का जन्म हो गया था और विभिन्न कारणों से राष्ट्रीय जागरण की जा भावना धीरे-धीरे तीव्र भी हो रही थी। सन 1857 ईसवी में अंग्रेजी शासकों की अत्याचार पूर्ण तथा दमनकारी नीति के विरुद्ध भारतीयों ने अपनी स्वतंत्रता के लिए एक सशस्त्र संघर्ष किया जिसे भारतीय इतिहास में 1857 की क्रांति, सैनिक संघर्ष, प्रथम स्वाधीनता संग्राम आदि नामों से पुकारा जाता है। ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध 1857 की क्रांति भारतीय इतिहास के एक महत्वपूर्ण तथा युगांत कारी घटना थी।

1857 के स्वतंत्रता संग्राम के कारण

राजनीतिक कारण

  • ब्रिटिश अधिकारियों की तानाशाही- सन 1857 ईसवी की क्रांति का एक प्रमुख कारण जाता के ब्रिटिश अधिकारी भारती कर सको तथा व्यापारियों के साथ दुर्व्यवहार किया करते थे। ब्रिटिश अधिकारी व्यापारियों का माल कम मूल्य पर बलपूर्वक खरीद लेते थे। उनके इस व्यवहार से अधिकांश भारतीय असंतुष्ट थे जब 1857 ईसवी का संघर्ष हुआ तब वह भी इसमें शामिल हो गए।
  • ईस्ट इंडिया कंपनी का कुशासन- ईस्ट इंडिया कंपनी के संचालक विदेशी अंग्रेज भारतीयों का सम्मान नहीं करते थे। वह भारतीयों पर तरह-तरह के अत्याचार करते थे।भारतीयों के प्रति उनका व्यवहार बड़ा मानवीय रहता था जिससे जनता उनकी विरोधी होती जा रही थी।
  • डलहौजी की साम्राज्यवादी नीति- अट्ठारह सौ सत्तावन ईसवी के स्वतंत्रता संग्राम का प्रमुख कारण लॉर्ड डलहौजी की साम्राज्यवादी नीति थी। डलहौजी ने गोद प्रथा को समाप्त कर दिया था और युद्ध में अनेक राज्यों को अन्यायपूर्ण ढंग से ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया था। देसी राजा से असंतुष्ट हो गए थे।डलहौजी ने उचित अनुचित के विचार का परित्याग करके साम्राज्य विस्तार की नीति को ही सर्वोपरि महत्व दिया जिससे उसके प्रति असंतोष बढ़ता जा रहा था।अता अंग्रेजों के विरुद्ध हुए इस संघर्ष में सम्मिलित होकर देसी राजा भी अंग्रेजों का सामना करने के लिए तैयार हो गए।
  • मुगल सम्राट के प्रति व्यवहार- मुगलों की शक्ति क्षीण होती जा रही थी तथा उनका स्वतंत्र अस्तित्व नाममात्र को ही बचा था फिर भी मुगल सम्राटों को प्रजातंत्र सम्मान देती थी।मुगल शासकों का नाम उस समय के सिक्के पर अंकित किया जाता था तथा ब्रिटिश अधिकारी भी सर झुका कर उनका आदर सम्मान करते थे। परंतु 1835 ईस्वी में मुगल शासकों का नाम मुद्राओं पर अंकित होना बंद हो गया तथा अंग्रेजों ने उनका सम्मान करना छोड़ दिया। इससे आम जनता असंतुष्ट होकर स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के लिए उत्साहित हो उठी।
  • सरकारी नौकरी में भारतीयों की उपेक्षा- उस समय सरकारी नौकरी में उच्च पदों पर केवल अंग्रेजों को ही नियुक्ति की जाती थी जिसके फलस्वरूप भारतीय बुद्धिजीवी अपमान का घूंट पीकर रह जाते थे। उनके हृदय में उपजे असंतोष से क्रांति की ज्वाला बढ़ती गई और उन्होंने भी स्वतंत्र संग्राम में बढ़ चढ़कर भाग लिया।

सामाजिक कारण

  • भारतीय जनता के प्रति दुर्व्यवहार- उच्च पदों पर ब्रिटिश अधिकारी ही आसीन थे तथा उच्च शिक्षित भारतीय उनके अधीन कार्य करते थे।अंग्रेज संकोच सैनिक का तथा भारतीयों को निम्न श्रेणी का समझते थे तथा भारतीयों का अपमान भी करते थे। जनता में बैठे अधिकारियों के इस दुर्व्यवहार के प्रति असंतोष उत्पन्न होने लगा था।
  • सामाजिक रीति-रिवाजों में हस्तक्षेप- ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों के परंपरागत सामाजिक रीति-रिवाजों में हस्तक्षेप कर अनेक सुधार किए थे। यद्यपि किए गए सुधार उचित है परंतु आ परंपरागत रीति-रिवाजों के विरुद्ध थे।इससे अधिकांश भारतीय अंग्रेजों से नाराज हो गए और उनके हृदय में संघर्ष की भावना जागृत हो उठी।

धार्मिक कारण

  • गोद लेने की प्रथा का अंत- लॉर्ड डलहौजी नया नियम बना दिया था कि यदि किसी राजा की संतान नहीं है और उसने कोई संतान गोद ली है तब उसकी मृत्यु के पश्चात राज्य पर गोद ली गई संतान का अधिकार ना होकर ब्रिटिश कंपनी का अधिकार होगा इस नीति से भारतीय डलहोजी से ग्रहण करने लगे थे।
  • हिंदू मुस्लिम धर्म का निरादर- ईसाई धर्म उपदेशक हिंदू और मुस्लिम धर्म की निंदा खुले रूप में करते थे तथा अपने इसाई धर्म का जोर से प्रचार किया करते थे। इसके साथ ही उन्होंने दोनों धर्मों के लोगों को इसाई भी बनाया।
  • पाश्चात्य शिक्षा-संस्कृत का प्रसार- भारत में सहयोग के अनेक शिक्षा संस्थाओं में ईसाई धर्म तथा रीति-रिवाज आदि विषयों पर अंग्रेजी माध्यम से निशुल्क शिक्षा दी जाती थी। इससे भारतीयों को लगा कि एक दिन भारतीय शिक्षा संस्कृत अवश्य ही विलीन हो जाएगी अतः भारतीय अंग्रेजो के विरुद्ध हो गए।

आर्थिक कारण

  • भारतीय उद्योग-धंधों का विनाश- अंग्रेजों कि व्यापार नीति के कारण भारतीय उद्योग-धंधे चौपट हो गए थे।इंग्लैंड की मशीनों से बनी वस्तुएं सस्ती होने से उनकी बिक्री बढ़ रही थी जबकि भारतीय वस्तुओं की बिक्री कम हो रही थी।इससे बड़ी संख्या में भारतीय बेरोजगार हो गए तथा व्यापारी वर्ग भी अंग्रेजों से नाराज हो गए।
  • कृषकों का शोषण- अंग्रेजों ने जमींदारों को भूमि का स्थाई स्वामी बना दिया था।जमींदार किसानों से मनमाना लगान वसूल करते थे जिससे किसानों की स्थिति बड़ी सोच नहीं हो गई थी और वे अपनी आजीविका कमाने में असमर्थ हो गए थे।कृषक अन्य कोई कार्य उद्योग धंधा भी नहीं कर सकते थे, क्योंकि उनके पास उनके लिए धन का अभाव था।

1857 ईस्वी के स्वतंत्रता संग्राम के परिणाम

भारतीय संग्राम ने भारतवासियों तथा अंग्रेजो, दोनों को ही भविष्य के लिए सतर्क कर दिया। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के निम्न परिणाम निकले-

  • कंपनी के शासन का अंत- भारत में 1757 ईस्वी के बाद 100 वर्ष तक ईस्ट इंडिया कंपनी ने शासन किया था। यह अनादर तथा अन्य पूर्व शासन 1857 ईसवी के संघर्ष द्वारा समाप्त हो गया तथा कंपनी के स्थान पर अधिक उदार तथा न्याय पूर्ण ब्रिटिश सम्राट था ब्रिटिश संसद का शासन प्रारंभ हो गया। कंपनी कि ‘बोर्ड ऑफ कंट्रोल’ तथा ‘कोर्ट आफ डायरेक्टर्स’ नामक संस्थाएं भी समाप्त हो गई। नए प्रशासकीय ढांचे के अनुसार भारतीय शासन के लिए ब्रिटिश संसद के प्रति उत्तरदाई एक मंत्री के नियुक्त की गई।
  • ब्रिटिश नीति में परिवर्तन- 1857 की क्रांति दबाने के पश्चात अंग्रेजों ने ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति अपना ली क्योंकि संघर्ष के मुख्य बात हिंदू मुस्लिम एकता थी। इस संग्राम में हिंदू और मुसलमान के कंधे से कंधा मिलाकर लड़े थे अंग्रेजों ने इन दोनों के मध्य उत्पन्न करने का यथासंभव प्रयास किया।
  • सेना के संगठन में परिवर्तन- संघर्ष के दिनों में अंग्रेजों को अपने सैन्य संगठन के दोषों का भी ज्ञान हो गया था। अतः संघर्ष के पश्चात ब्रिटिश सेना का पुनर्गठन किया गया। सेना में भारतीय सैनिकों की संख्या आधी और ब्रिटिश सैनिकों की संख्या दोगुनी कर दी गई। इसके अतिरिक्त तोपखाने को भारतीय सैनिकों के हाथ से लेकर ब्रिटिश सैनिकों के हाथ में दे दिया गया।
  • मुगल वंश के शासन की समाप्ति- 1857 ईसवी के संघर्ष में मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर ने भी भाग लिया था अतः संघर्ष असफल हो जाने के परिणाम स्वरुप बहादुर शाह जफर को गिरफ्तार कर रंगून भेज दिया गया जहां उनकी मृत्यु हो गई।
  • शासन की नीति में परिवर्तन- जब भारत का शासन ब्रिटिश संसद के हाथों में चला गया तो शासन की नीति में भी परिवर्तन हुआ। नवीन नीति की घोषणा में कहा गया कि-
  1. ब्रिटिश सरकार कंपनी द्वारा भारतीय शासकों के साथ की गई समस्त संधियों का सदैव आदर करेगी।
  2. भारतीय जनता को पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता प्राप्त होगी।
  3. जनता के कल्याण के लिए अनेक योजनाएं लागू की जाएगी।
  4. सरकारी नौकरियों के द्वार सभी के लिए खुले रहेंगे।
  • राष्ट्रवादी भावनाओं का विकास- 1857 ईसवी के स्वतंत्रता संग्राम के परिणाम स्वरुप भारतीयों में राष्ट्रीयता की भावना का और अधिक तीव्र गति से विकास हुआ। इस संबंध में डॉ आर सी मजूमदार का कथन उचित ही प्रतीत होता है की- “1857 ईसवी के संघर्ष की यादें भारत में अंग्रेजी शासन को उससे अधिक क्षति पहुंचाए जितनी कि स्वयं क्रांति ने पहुंचाई थी।”

पुनर्जागरण ने मानवों के विचारो, चिंतन जीवन शैली के साथ-साथ कला संस्कृति तथा आर्थिक स्वरूप को एकदम बदल कर रख दिया।

स्मरणीय बिंदु

1857 ईसवी की क्रांति भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम थी।

रानी लक्ष्मीबाई, बहादुर शाह जफर, नाना साहब, तात्या टोपे, मंगल पांडे, कुंवर सिंह, बेगम हजरत महल तथा रानी अवंती बाई क्रांति के प्रमुख नेता थे।

क्रांति असफल होते हुए भी बड़ी प्रभावशाली तथा गौरवशाली सिद्ध हुई।

क्रांति के फलस्वरूप भारत से कंपनी शासन का अंत हो गया तथा ब्रिटिश सरकार का शासन प्रारंभ हो गया।

6 अप्रैल, 1857 ईसवी को बैरकपुर छावनी में मंगल पांडे के संघर्ष के साथ क्रांत की प्रथम चिंगारी भड़की।

10 मई, 1857 ईस्वी को मेरठ में सैनिक विद्रोह के साथ क्रांति का ज्वालामुखी फुट निकला।

12 मई, 1857 ईस्वी को दिल्ली के लाल किले में बहादुर शाह जफर को भारत सम्राट घोषित कर दिया गया।

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