प्रथम स्वतंत्रता संग्राम- कारण एवं परिणाम

लॉर्ड डलहौजी के बाद 1856 में लॉर्ड कैनिंग भारत में अंग्रेजों का अंतिम गवर्नर जनरल था।18 से 56 तक गवर्नर जनरल ने अपनी विभिन्न नीतियों के कारण भारत पर विजय लगभग पूर्ण कर ली थी। भारत में विदेशी शासन छल बल, सैन्य बल तथा अर्थ बल का टिक हुआ था, किंतु 1757 में प्लासी युद्ध के समय से ही किसानों कारीगरों,शिल्पकारो,राजाओं और सिपाहियों अंग्रेजो के बीच विवाद उत्पन्न होने लगे। इसके पूर्व भी समय-समय पर देश के विभिन्न भागों में निम्नलिखित विद्रोह भी हुए:

  • सयासियो एवं पतियों द्वारा धार्मिक पुनरुत्थान के लिए बंगाल का विद्रोह।
  • सिपाहियों का विदेशी शासकों एवं विदेशी प्रशासन के विरुद्ध विद्रोह।
  • मध्यप्रदेश में भील, बंगाल, बिहार में संथालो, उड़ीसा में कोल तथा मेघालय की खांसी आदि जनजातियों का अंग्रेजों की शोषण के विरुद्ध विद्रोह।

लेकिन इन विद्रोह के स्थानीय होने के कारण तथा पारस्परिक समन्वय के अभाव के कारण अंग्रेजों द्वारा आसानी से इसका दहन कर दिया गया।इसके बावजूद अंग्रेजों की दमन नीति के खिलाफ भारतीय क्रांतिकारियों का विद्रोह जारी रहा और सन 1857 की क्रांति के नाम से जाना जाता है। इस जन असंतोष ने उत्तर तथा मध्य भारत में ब्रिटिश राज्य को कुछ समय के लिए लगभग समाप्त कर दिया था।

क्रांति की प्रमुख घटनाओं में उत्तर प्रदेश का योगदान

बैरकपुर-लॉर्ड कैनिंग चर्बी युक्त कारतूस के प्रयोग के लिए भारतीय सैनिकों के साथ धोखाधड़ी की। 29 मार्च सन 1857 को बंगाल छावनी के सिपाही मंगल पांडे ने कारतूस के प्रयोग से मना कर दिया तथा अपने साथियों को विद्रोह के लिए संगठित किया। इसके परिणाम स्वरूप मंगल पांडे को फांसी दे दी गई।

मेरठ-9 मई की घटना के अनुसार 90 में से 85 सिपाहियों ने कारतूस में दांत लगाने से मना कर दिया।इस कारण इन सिपाहियों को 10 वर्ष की जेल की सख्त सजा दी गई।10 मई 1857 ईस्वी को मेरठ में तैनात पूरी भारतीय सेना ने विद्रोह कर दिया तथा जेल पर धावा बोल कर अपने साथियों को थोड़ा लिया और कई अंग्रेज अधिकारियों को मार डाला।

इलाहाबाद (प्रयागराज)-जून 1857 ईस्वी में लियाकत अली ने नेतृत्व में क्रांति का बिगुल बजा,लेकिन जनरल नील ने इस क्रांति का दमन कर दिया।

फैजाबाद(अयोध्या)-1857 ईसवी के स्वतंत्रता संग्राम का फैजाबाद में नेतृत्व मौलवी अहमदुल्लाह ने किया। कैंपवेल ने यहां के स्वतंत्रता संघर्ष को दबा दिया।

बहराइच-राजा हर दंत सिंह ने बहराइच में क्रांति का नेतृत्व किया उन्होंने अपने बौंडी के किले से अंग्रेजों का कड़ा मुकाबला किया लेकिन अंततः वीरगति को प्राप्त हो गए।

इसके बाद हजारों सैनिकों ने दिल्ली की ओर कूच किया।वहां के लोग उनके साथ मिलकर लाल किले पहुंचे वहां पहुंचकर बहादुर शास्त्री को भारत का शासक घोषित कर दिया।लेकिन 4 माह बाद अंग्रेजों ने दिल्ली पर पुनः आधिपत्य जमा लिया।बहादुर शाह द्वितीय की 1862 ईस्वी में रंगून में मृत्यु हो गई।यह घटना मध्य भारत तथा रुहेल खंड आग की तरह फैल गई।इसके कारण बरेली,कानपुर,लखनऊ,वाराणसी तथा झांसी के सैनिकों ने अंग्रेजों के विरुद्ध अधिक हथियार उठा लिया।

बरेली-बरेली में खान बहादुर खान ने क्रांति का नेतृत्व किया उन्होंने स्वयं को नवाब घोषित कर दिया।कैंपबेल के नेतृत्व में यहां की क्रांति को दबाया गया तथा खान बहादुर खान को फांसी दे दी गई।

कानपुर-नाना साहब मानपुर में पेशवा घोषित कर दिए गए।अजीम उल्ला खान नाना साहब का संयोगी था।नाना साहब ने अंग्रेज की सारी फौज को कानपुर में खदेड़ दिया।नाना साहब ने आत्मसमर्पण करने वाले सिपाहियों को छोड़ दिया।अंग्रेज सिपाहियों को नाव द्वारा नाना साहब सुरक्षित इलाहाबाद भेज रहे थे किंतु जैसे ही यह लोग नाव पर बैठे वैसे ही नाना साहब के आदमियों ने उन पर आक्रमण करके महिलाओं और बच्चों को छोड़कर सभी को मार डाला। इसके बाद अंग्रेज जर्नल हैवलॉक ने कानपुर पर कब्जा करके नाना साहब को नेपाल भेज दिया। नाना साहब के बाद जर्नल तात्या टोपे ने कानपुर की कमान संभाली,किंतु उनके आदमियों ने उनके साथ विश्वासघात किया जिसके कारण 1859 इसवी में तात्या टोपे को फांसी दे दी गई।

लखनऊ-अवध की राजधानी लखनऊ की क्रांति की बागडोर वाजिद अली शाह की बेगम हजरत महल ने संभाली।क्रांतिकारियों ने रेजीडेंसी का घेराव कर लिया।अंत में अंग्रेजों का लखनऊ पर अधिपत्य हो गया।बाद में बेगम हजरत महल नेपाल चली गई।

आजमगढ़-आजमगढ़ में स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व बाबू कुंवर सिंह ने किया। अतरौलिया नामक स्थान पर उन्होंने मिलमैन एवं डेंस की संयुक्त अंग्रेजी सेना को पराजित किया। युद्ध में लड़ते लड़ते 26 अप्रैल 1858 ईस्वी को इनकी मृत्यु हो गई।विलियम टेलर तथा विंसेंट आयर मैं यहां के स्वतंत्रता संघर्ष को दबा दिया।

झांसी-झांसी में रानी लक्ष्मीबाई सर हीरोज की सेना के साथ बहादुरी से लड़ी किंतु झांसी पर अंग्रेजों ने अधिकार कर लिया।कालपी में रानी तात्या तोपे से मिल गई।उन्होंने एक साथ ग्वालियर के सिंधिया पर आक्रमण करके किले पर अधिकार कर लिया।लेकिन बाद में सर हीरोज ने ग्वालियर पर अधिकार कर लिया रानी बहादुरी से लड़ते हुए मारी गई।

इसी प्रकार रामगढ़ की रानी अवंती बाई ने विद्रोह का झंडा खड़ा किया परंतु अंग्रेजों ने स्वतंत्रता संघर्ष को दबा दिया।इस प्रकार या महान संघर्ष 1857 ईस्वी में आरंभ हुआ परंतु 1858 ईसवी में इसका अंग्रेजों द्वारा दमन किया गया।

क्रांति के परिणाम

सन 1857का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम भारतीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना थी।इसने एक युग का अंत कर दिया और एक नवीन युग के बीज बोए। प्रदेशिक विस्तार के स्थान पर आर्थिक शोषण का युग प्रारंभ हुआ।

सन 57 के विद्रोह का यद्यपि पूर्णतया दमन हो गया फिर भी इसने भारत में अंग्रेजी साम्राज्य को जड़ से हिला दिया था।दोबारा सन 57 जैसी घटना ना हो तथा ब्रिटिश शासन कोव्यवस्थित एवं शुद्ध रेस्ट करने के लिए महारानी विक्टोरिया ने 1858 इसवी के अपने घोषणा पत्र में कुछ महत्वपूर्ण नीतियों का उल्लेख किया।इस घोषणा से दोहरा नियंत्रण समाप्त हो गया और ब्रिटिश सरकार ही सीधे भारतीय मामलों के लिए उत्तरदाई हो गई।

इस क्रांति ने भारतीयों में राष्ट्रीय भावना का संचार किया और उन्हें अपनी मातृभूमि को विदेशी शासकों से मुक्ति दिलाने के लिए प्रेरित किया।

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