अंग्रेज भारत छोड़ने को विवश

अंग्रेज सरकार ने राष्ट्रीय आंदोलन को तो विफल कर दिया था, लेकिन उसे आभास हो गया था कि भविष्य में आंदोलन पुनः छोड़ सकता है।अता अंग्रेजों ने भारतीयों को प्रसन्न करने के लिए 1935 ईस्वी का अधिनियम पारित किया। इस अधिनियम के अंतर्गत-

  • केंद्र में अखिल भारतीय संघ की कथा प्रांतों को प्रांतीय स्वायत्तता की स्थापना की व्यवस्था की गई
  • इस संघ में भारत के प्रांतों तथा देसी रियासतों को शामिल किया गया।
  • यदि व्यवस्था की गई कि केंद्र की विधि एका में देसी राजाओं द्वारा मनोनीत प्रतिनिधि भी रहेंगे।
  • केंद्रीय विधायिका के अधिकार क्षेत्र से विदेश तथा रक्षा विभाग बाहर रखे गए।

शेष सभी विषयों पर गवर्नर जनरल का विशेष नियंत्रण था, क्योंकि गवर्नर तथा गवर्नर जनरल की नियुक्ति ब्रिटिश सरकार करती थी, अतः वह उसी के प्रति उत्तरदाई थे। इस अधिनियम की भारतीयों द्वारा कटु आलोचना हुई।

सितंबर 1939 ईस्वी मैं जब द्वितीय विश्व युद्ध प्रारंभ हो गया तो ब्रिटिश सरकार ने भारत को इस युद्ध में झोंक दिया। कांग्रेश विश्व युद्ध में अंग्रेजो को सहायता नहीं देना चाहती थी। उससे बिना विचार विमर्श किए भारत को युद्ध में शामिल किए जाने के विरोध में, अक्टूबर 1939 ईस्वी में सभी कांग्रेसी मंत्री मंडलों ने त्यागपत्र दे दिया।

व्यक्तिगत सत्याग्रह (1940 ईस्वी)

कांग्रेस मंत्रिमंडल त्यागपत्र देने के पश्चात गांधीजी ने पुनः आंदोलन प्रारंभ कर दिया। उन्होंने युद्ध के विरोध में सीमित पैमाने पर सत्याग्रह करने की योजना बनाई। सत्याग्रह करने वाले पहले व्यक्ति विनोवा भावे थे। अन्य सत्याग्रह में चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, मौलाना अब्दुल कलाम आजाद प्रमुख थे।इन सब त्याग राज्यों ने जनता में यह संदेश पहुंचाया कि अंग्रेजों को युद्ध में मदद ना दी जाए। व्यक्तिगत सत्याग्रह का नारा था युद्ध में सफलता ना करना।ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस नेताओं से समझौता वार्ता की किंतु कांग्रेश के नेताओं ने अंग्रेजों से स्पष्ट कह दिया कि उनका लक्ष्य पूर्ण स्वराज्य है और इस दिशा में अधिक विलंब सहन नहीं होगा।

भूमिगत गतिविधियां

इस बीच देश में विद्रोहियों का एक भूमिका ढांचा भी तैयार हो गया था। इस आंदोलन का बागडोर अरुणा आसफ अली , राम मनोहर लोहिया, सुचेता कृपलानी, बीजू पटनायक तथा आरपी गोयनका आदि ने संभाली।भूमिगत कार्यवाही ओं में लगे हुए लोगों की संख्या सीमित अवश्य थी परंतु उनको जनता से व्यापक सहयोग प्राप्त हुआ। भूमिगत आंदोलन की मुख्य गतिविधि फूलों को उड़ाना, टेलीफोन के तार काटना तथा रेल की पटरियों को उखाड़कर संचार माध्यम को नष्ट करना था।

आजाद हिंद फौज का संघर्ष

आजाद हिंद फौज का नाम आते ही सुभाष चंद्र बोस का नाम सहज ही स्मरण हो आता है। उनका यह विश्वास था कि बिना सशस्त्र युद्ध किए भारत अंग्रेजों के शासन से मुक्ति नहीं पा सकता। अतः सुभाष चंद्र बोस ने फारवर्ड ब्लाक नाम से युवकों का एक संगठन प्रारंभ किया। परिणाम स्वरूप सरकार ने उन्हें बंदी बना लिया। कुछ दिनों बाद उन्हें जेल से छोड़ तो दिया गया लेकिन उनके मकान में ही उन्हें नजरबंद कर दिया गया। जनवरी 1943 ईस्वी चुपचाप घर से निकलकर काबुल होते हुए जर्मनी से जापान जा पहुंचे। जर्मनी और जापान की सहायता से उन्होंने आजाद हिंद फौज का गठन किया।द्वितीय विश्व युद्ध में जर्मनी द्वारा बंदी बनाए गए 50000 सैनिक स्वेच्छा से आजाद हिंद फौज में भर्ती हो गए।

उन्होंने आम नागरिकों को भी इस फौज में भर्ती किया। इस फौज में स्त्री सैनिकों का भी एक दल रानी झांसी रेजिमेंट के नाम से बनाया गया। आजाद हिंद फौज के सिपाही सुभाष चंद्र बोस को नेताजी कहते थे। उन्होंने अपने अनुयायियों को जय हिंद और हिंदी चलो के नारे दिए। 4 जुलाई 1944 ईस्वी को आजाद हिंद रेडियो पर बोलते हुए उन्होंने गांधीजी को संबोधित करते हुए कहा भारत की स्वाधीनता का आखिरी युद्ध शुरू हो चुका है।राष्ट्रपति भारत की मुक्त के इस पवित्र युद्ध में हम उनका आशीर्वाद और शुभकामनाएं चाहते हैं।सुभाष चंद्र बोस ने भारतवासियों को संघर्ष में शामिल होने का आह्वान करते हुए कहा ‘तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा।’

आजाद हिंद फौज ने रंगून से दिल्ली के लिए कुच किया।आजाद हिंद फौज वर्मा तक अंग्रेजों की फौज से लड़ती चली आई किंतु द्वितीय विश्व युद्ध 1944 ईस्वी में जापान की पराजय होने से युद्ध की स्थिति बदल गई। आजाद हिंद फौज का अभियान दुख गया और फौज को आत्मसमर्पण करना पड़ा। इन बहादुर देशभक्त सैनिकों पर दिल्ली के लाल किले में मुकदमा चलाया गया।

भारत का विभाजन

स्वतंत्रता का अवसर जैसे पास आया, वैसे हिंदू और मुसलमान संप्रदायवादी लोग अपने अपने हितों के लिए बुरी तरह डट गए। इस हालात में 1940 ईस्वी में मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लिंग नामक संगठन ने मांग की कि मुसलमानों को अपना अलग राष्ट्र मिलना चाहिए, क्योंकि भारत में उन पर हिंदुओं का प्रभुत्व रहेगा और वह विकास नहीं कर पाएंगे। अलग राष्ट्र पाकिस्तान की मांग को लेकर मुस्लिम लिंग ने लोगों के बीच आंदोलन छेड़ा। जगह-जगह हिंदू और मुसलमानों के बीच भयंकर दंगे होने लगे।

अंग्रेजों ने हिंदुओं का विभाजन करके पाकिस्तान नाम से अलग राष्ट्र बनाया। पाकिस्तान में रहने वाले कई हिंदू भारत आने लगे और भारत में रहने वाले कई मुसलमान पाकिस्तान जाने लगे।पर अनेक हिंदू मुसलमान अपनी पुरानी जगहों पर ही रहे।उन दिनों हिंदू और मुसलमानों के बीच भीषण दंगे भड़क उठेवह एक दूसरे के प्रति नफरत और घृणा की बातें फैलाई गई।गांधी जी यहां सब स्वीकार चलने को तैयार नहीं थे।77 वर्ष की उम्र में वे भयानक दंगों के बीच लोगों को समझाने बुझाने चल दिए।उन्होंने कहा मैं अपनी जान की बाजी लगा दूंगा पर या नहीं होने दूंगा कि भारत में मुसलमान लोग व्यंग कर दिए।उन्हेंआत्मसम्मान के साथ चलना है।

वेयर इस सिद्धांत पर एडिंग थे कि भारत में हिंदू और मुसलमान के लिए बराबर जगह है। यह बात हिंदू संप्रदायवादी नहीं मानते थे वे चाहते थे कि भारत में हिंदू लोगों को प्रमुख स्थान मिले।उनमें से एक नाथूराम गोडसे ने 30 जनवरी 1948 ईस्वी को गांधी जी को गोली मारकर हत्या कर दी।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.